अभिभावक अपने बच्चे के विषय चयन मे न थोपे अपनी मन-मर्जी

डॉ राज किशोर राम
स्नेहा (काल्पनिक नाम) अपने माता-पिता की लाडली बेटी होने के साथ ही  दो बहनो में छोटी होने कारण वह बड़ी बहन की भी दुलारी रही है। उसके माता एवं पिता दोनों ही अलग-अलग प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। माता इंजीनीयरिंग कॉलेज में इंजीनीयरिंग विभाग के प्रोफेसर है जबकि पिताजी कॉमर्स के प्रोफेसर हैं। उसे जन्म से ही तमाम तरह की सुख-सुविधाएँ मिली हुई थी और इससे भी कहीं ज्यादा परिवार के सदस्यों से उसे लाड़-प्यार मिला । उसकी प्रारम्भिक शिक्षा अच्छी श्रेणी के इंग्लिश मीडियम स्कूल से हुई। बारहवीं  विज्ञान (मुख्य विषय गणित) से उत्तीर्ण हुयी । उसके माता-पिता उसे इंजीनियर बनाना चाहते थे इसका एक कारण यह था कि उसकी बड़ी बहन इंजीनियर थी और दूसरी वजह यह थी कि उसके माता-पिता में भी एक समान्य अभिभावक की  सोच रही थी। वें अपने बच्चों को सफल होते हुए देखना चाहते थे। जैसा कि यह सर्वविदित है कि भारत में सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला विषय कमाई एवं इज्जत के दृष्टिकोण से मेडिकल, इंजीनीयरिंग एवं मैनेजमेंट है इसी सोच के साथ उसके माता-पिता ने भी उसे इंजीनियर बनाना चाहा, ताकि उसे जल्दी से नौकरी मिल जाए और वह आत्म-निर्भर बन सके। भारत में एक कटु सत्य यह भी है कि अच्छी नौकरी होने से शादी के लिए बिलकुल भी मशक्त नहीं करनी पड़ती है। लड़के के संदर्भ मे यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अगर लड़के को नौकरी हो तो उसे मनपसंद लड़की के साथ खूब सारा पैसा के साथ दान-दहेज भी बिना मांगे मिल जाते है जबकि लड़की को नौकरी हो तो उसे अच्छा घर-परिवार के साथ अच्छा लड़का (बड़े नौकरीवाला) भी बड़े आराम से मिल जाता है।
बहरहाल उसका नामांकन बैंगलोर के अच्छे इंजीनीयरिंग कॉलेज मे मिल जाती है और फिर शुरू होती है उसके जीवन की दूसरी पारी। चूंकि इससे पहले वह कभी भी घर से बाहर अकेले नहीं रही थी यहाँ तक कि वह अकेले यात्रा तक नहीं की थी। यह बदलाव उसके जीवन में अचानक से एक नया चुनौती बनकर सामने आया था। उसके मन मे उस वक्त क्या चल रहा होगा कोई भी नहीं जनता। एक तरफ जहां उसके मन में अपने माता-पिता के प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर होने पर गर्व होगा तो दूसरी ओर अपने बहन के इंजीनियर होने का दबाव। इस तरह से शायद वह यह सोच पा रही होगी कि वह आराम से अपना कोर्स पूरा कर लेगी।
चूंकि वह स्वभाव से शांत, शालिन एवं पढ़ाई के प्रति काफी मेहनती थी। सेमेस्टर नजदीक आने वाले थे वह सभी विद्यार्थियों की भाँति काफी मेहनत करके पढ़ाई करने लगी। अब समय आ गया। कल उसकी परीक्षा होनी थी और आज से ही उसे तेज बुखार और सिर दर्द होने शुरू हो गए। जब कल वह सुबह में नींद से उठी तो पता चला कि उसकी स्थिति अच्छी नहीं है फिर भी उसे परीक्षा देने के लिए जाना ही पड़ा। वह परीक्षा-कक्ष में अंदर प्रवेश की अपने निर्धारित स्थान पर बैठी, प्रश्न-पत्र मिलने ही वाला था और उसका हाल-बेहाल बना हुआ था। वह पूरी तरह से डरी हुई पसीने से लथपथ थी उसकी धड़कने जोर-जोर से धडक रही थी। रक्त का प्रवाह तेज हो गया था। उसके हाथ काँप रहे थे। अंततः प्रश्न-पत्र मिले। वह प्रश्न लिए बैठी रही। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। क्या करे क्या न करे। फिर भी वह जैसे- तैसे परीक्षा खत्म करके अपने हॉस्टल में लौट आती है। इसी तरह से उसके सारे पेपर खत्म हो जाते है। अब रिज़ल्ट की बारी थी। जब उसने अपना रिज़ल्ट देखा तो पता चला की वह कई पेपर मे फेल है। इसके दूसरे, तीसरे और चौथे सेमेस्टर का भी यही हाल रहा था।
उसके रिज़ल्ट एवं स्वास्थ्य का हाल देखकर उसके माता-पिता एवं उसकी बहन भी काफी हैरान-परेशान रहने लगे। उसे हर तरह से समझाने की कोशिश की गयी, पर सबकुछ निरर्थक साबित हुआ। अब उसकी हालत इतनी खराब हो गई, कि वह कई-कई दिनों तक बीमार रहने लगी। उसे कॉलेज से आराम दिलाने के लिए घर वापस बुला लिया गया।
चूंकि उसके पिता एक प्रोफेसर थे इसलिए इस स्थिति को वह कई दिशा में सोचने की कोशिश कर रहे थे और उन्हे समझ मे आ रहा था कि शायद उनकी बेटी को कुछ मनोवैज्ञानिक समस्या उत्पन्न हो गई है। उन्होने एक मनोवैज्ञानिक की खोज को आरंभ कर दिया। अंत मे उनका मुझसे संपर्क हुआ। मैंने पहली मीटिंग में बातचीत किया। तो कई महत्वपूर्ण बातें सामने आयी। उसने अपने माता-पिता के दबाव में इंजीनीयरिंग विषय का चुनाव की थी। उसके ऊपर कई तरह के मानसिक दबाव थे। जिसमें उसकी बहन की नौकरी इत्यादि भी शामिल थी ।
मैंने परामर्श का सत्र शुरू किया तो मुझे पता चला कि वह इंजीनीयरिंग नहीं पढ़ना चाहती है। मैंने तीन सत्र के बाद उसके पिता को बुलाया और उसके विषय (इंजीनीयरिंग) को परिवर्तन करने के बारे में बताया तो वह मान गए। अब उसे कॉमर्स (प्रतिष्ठा) मे नामांकन दिला दिया गया है, इसके साथ ही उसके व्यवहार मे कई तरह के बदलाव देखे गए। वह खुश रहने लगी। अभी पढ़ाई में अच्छा कर रही है।
इस तरह से मैं तमाम अभिभावकों से आग्रह करना चाहता हूँ कि आप अपने बच्चों को अच्छे से समझे और उनके विषय के चयन में सहायक बने ताकि आपके बच्चे सफलता के नित्य नए आयाम को छूं सकें। विषय के चयन हेतु कुछ महत्वपूर्ण परामर्श निम्न हैं:
• वर्तमान समय में अभिभावक समाज में अपना प्रभाव (स्टेटस सिम्बल) बनाने के लिए किसी खास विषय में अपने बच्चे का नामांकन कराते है, ऐसा न करें।
• बरहवीं (प्लस टू) के बाद अपने बच्चे के विषय चयन में अपनी इच्छा को अपने बच्चे पर न थोपें।
• कई बार अभिभावक अपने बच्चे में अपनी छवि देख रहे होते है। ऐसा न करें यह घातक हो सकता है।
• विषय चयन में अपने बच्चे की इच्छा एवं रुचि को ध्यान में जरूर रखें।
• अपने पड़ोस के बच्चे को देखकर अपने बच्चों का विषय का चयन न करें, क्योंकि प्रत्येक बच्चा अपने-आप मे अनोखा है, अतः सबकी क्षमता अलग-अलग होती है।
• किसी व्यक्ति के कहने से भी विषय का चयन न करें।
• सफल होने के लिए हमेशा कोई खास विषय की जरूरत नहीं होती है, बल्कि विषय को अच्छे से समझने की जरूरत होती है। सफलता आपके बच्चे की कदम चूमेगी।
• विषय चयन में विषय की संभावना का ख्याल रखना बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।
• विषय चयन में विषय से संबन्धित खर्च की जानकारी पहले से लें।
• अगर आवश्यकता हो तो किसी परामर्शदाता (काउंसेलर) की सहायता ले सकते है।
• परामर्शदाता (काउंसेलर) बच्चे की अवश्यकताओं एवं रुचि को ध्यान में रखकर मनोवैज्ञानिक परीक्षण के पश्चात विषय के चयन में अंतिम निर्णय तक पहुँचते हैं।
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