आरोपियों की अविलंब गिरफ्तारी, पुलिस अधीक्षक एवं जिलाधिकारी पर सरकार की ओर से नहीं हुई कार्रवाई तो होगा बड़ा आन्दोलनः जाँचदल


दरभंगाः-(प्रेस विज्ञप्त) 4 नवम्बर 2018 को आॅल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवाँ की 7 सदस्यी जाँच टीम सितामढ़ी दंगा ग्रस्त क्षेत्र के पिड़ितों से मिलकर जाँच रिपोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सौंपी है। इस जाँच रिपोर्ट में पुलिस प्रशासन के रवैया पर गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। बेदारी कारवाँ के राष्ट्रीय अध्यक्ष नजरे आलम ने इस रिपोर्ट में कहा है कि अगर 19 अक्टुबर को ही पुलिस प्रशासन सचेत हो जाती तो इस हिंसा को रोका जा सकता था। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि यह दंगा मधुबन गाँव से शुरू हुआ जहाँ से पुलिस अधीक्षक के कार्यालय की दूरी 5 से 7 मिनट है लेकिन पुलिस को मधुबन पहुँचने में 42 मिनट लग गए। और उलटा अल्पसंख्यक समुदाय पर ही पुलिस ने दबाव बनाना शुरू कर दिया जब्कि बहुसंख्यक समुदाय को उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया गया था। इस का फायदा उठाकर दंगाईयों ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को जान से मारा, दुकाने जलाई, जानवर और जेवरात लूट लिए, घरों को जलाया, गैरेज का सामान लूट और कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया, कारोबारियों को दुकानें छोड़ भागने पर मजबूर किया, जामा मस्जिद के शटर पर लाठियां बरसाई गईं, पाकिस्तानियों को जलाकर राख कर दूँगा जैसे अनाप शनाप नारे और गालियाँ बकी गईं। आज की तारिख में भी बड़ी संख्या में जानवर के कारोबारी डर के मारे पुनौरा बाजार नहीं जा पा रहे हैं। बेदारी कारवाँ ने इस रिपोर्ट में कहा कि दंगा सुनियोजित था जिस में भाजपा के पूर्व विधायक पिन्टु प्रशांत काफी सक्रिय थे। नजरे आलम ने बताया कि मधुबन के स्थानीय लोगों ने बताया कि पुलिस अधीक्षक अगर चाहते तो 20 अक्टुबर को मधुबन गाँव दंगा की चपेट में नहीं आता क्योंकि 19 अक्टुबर को ही दुर्गा पुजा का जुलूस ले जाने को लेकर प्रशासन की ओर से जो रूट तय था उससे बहुसंख्यक समुदाय के लोग जुलूस नहीं लेजाकर अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ले जाने की जबरन जिद करने लगे थे जिसको लेकर तनाव पैदा हो गया था। उन्होंने यह भी कहा है कि इस दंगे से 10 दिन पहले ही यहाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी का भी इसी क्षेत्र में दौरा हुआ था। अपने रिपोर्ट में बेदारी कारवाँ के अध्यक्ष नजरे आलम ने शक जाहिर किया कि पुलिस प्रशासन विशेष पार्टी एवं विशेष विचारधारा के लिए काम कर रही है। उन्होंने पुलिस प्रशासन के एकतरफा रवैये पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि 3 सप्ताह के बाद भी दंगा के मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की जा सकी है। कारवाँ ने रिपोर्ट में लिखा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आज भी दहशत में हैं और रात को अपना घर छोड़ दूसरी जगह रहने पर मजबूर हैं। 20 अक्टुबर से ही मधुबन गाँव के बच्चे दहशत के कारण स्कूल नहीं जा रहे हैं। पुनौरा से गौशाला जाने वाली गाड़ियों से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को उतारकर मारा पीटा जाता है। उन्का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय की पुलिस प्रशासन ने आवेदन तक कबूल नहीं की है और अगर एक दो का कबूल किया भी है तो उस में सुंसगित धराएँ नहीं लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि दंगा के मुख्य आरोपी खुलेआम घुम रहे हैं और भाजपा के पूर्व विधायक पुलिस अधीक्षक से लगातार सांठ गांठ बनाए हुए हैं।

कारवाँ ने अपनी रिपोर्ट में ऐसे 8 व्यक्तियों का नाम शामिल किया है जो बेकसूर हैं उन्हें जेल में डाल दिया गया है जब्कि उन 13 पिड़ितों की डिटेल भी पेश किया है जिन के घर, दुकान और गाड़ियों को नुकसान पहुँचाया गया है। रिपोर्ट में अल्पसंख्यक समुदाय के नुकसानात की जो लिस्ट है उससे यह साफ हो गया है कि दंगाईयों ने बहुत ही सुनियोजित ढ़ंग से इस मामले को पुलिस प्रशासन की मिलिभगत से अंजाम दिया है और अल्पसंख्यक समुदाय को दहशत में जीने के लिए मजबूर कर दिया है।

श्री आलम ने आगे यह भी कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार पिछले दिनों एलान किए थे कि जिस क्षेत्र में दंगा होगा उस क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक एवं जिलाधिकारी दोषी होंगे और उनपर कार्रवाई की जाएगी लेकिन ऐसा कहीं से होता दिखाई नहीं दे रहा है। ना तो पुलिस अधीक्षक पर अबतक कोई कार्रवाई हुई है और ना ही जिलाधिकारी पर। सबसे गंभीड़ मामला तो यह है कि पुलिस अधीक्षक ने जैनुल अंसारी की हत्या को भी प्राकृतिक मौत बताकर मानवता को शर्मसार कर दिया है। जब्कि जैनुल अंसारी की हत्या पुलिस प्रषासन की मौजूदगी में गौषाला चैक पर किया गया था। और अबतक पुलिस अधीक्षक पर कोई कार्रवाई नहीं किया जाना सरकार के दावे को खोला साबित करता है साथ हीयह स्पष्ट हो गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह एलान भी हवा हवाई ही था। पत्रकारों से बात करते हुए श्री आलम ने बताया कि सरकार के मुखिया नीतीश कुमार को अल्पसंख्यक समुदाय पसन्द करते हैं यही कारण है कि इतना बड़ा दंगा पर आज भी अल्पसंख्यक समुदाय उम्मीद लगाए बैठा है कि सितामढ़ी और बिहार के अन्य दूसरे जिला में पिछले दिनों जहाँ भी दंगा हुआ था और अल्पसंख्यक समुदाय को नुकसान पहुँचा था उसके साथ न्याय होगा, इंसाफ मिलेगा। इसलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के इस उम्मीद को बनाए रखें और दंगा पिड़ित को उचित मुआवजा के साथ साथ पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी एवं दंगा में शामिल सभी आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई करते हुए जेल की सलाखों में डालें। अगर सरकार इस मामले को गंभीड़ता से नहीं लेती है तो आन्दोलन की शुरूआत की जायगी जिसका नुकसान 2019-20 के चुनाव में तथाकथित सेकुलर पार्टियों एवं वत्र्तमान सरकार को भी उठाना पड़ेगा। उक्त जाँच दल में कारवाँ के अध्यक्ष नजरे आलम के साथ कारी सुल्तान अख्तर, मो0 सफीउर रहमान (अधिवक्ता), उपाध्यक्ष मकसूद आलम पप्पु खान, मौलाना मेंहदी रजा कादरी, मौलाना गुलाम हक्कानी और विजय कुमार शामिल थे।

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