एक पत्रकार जिसने मुख्यमंत्री का पद ठुकरा दिया

अजय कुमार

आज जहां हर कोई पद के लिए सबकुछ ताक पर रखने के लिए तैयार  रहता है ऐसे में उस व्यक्तित्व को याद किया जाना बेहद जरूरी हो जाता है जिन्होंने  मुख्यमंत्री पद को यह कहकर ठुकरा दिया कि एक साहित्यकार व पत्रकार का मुख्यमंत्री बनना उसकी पदावनति होगी।
हां! आज हम  बात कर रहे हैं हिंदी साहित्य के विराट व्यक्तित्व पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी की। 4 अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक छोटे-से गांव बावई  में जन्मे माखनलाल बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। गांव में प्राइमरी शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर पर ही उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। राधा वल्लभ संप्रदाय से आने के कारण इन्हें वैष्णव पद कंठस्थ थे। 15 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हो गया।

जयंती विशेष

1908 में माधवराव सप्रे के ‛हिंदी-केसरी’ में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसमे खंडवा में बतौर अध्यापक कार्यरत  माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया। सप्रे माखनलाल चतुर्वेदी की लेखनी से इतने प्रभावित थे कि उनसे खुद मिलने खांडवा पहुंच गए।
अप्रैल 1913 में खंडवा के हिन्दी सेवी कालूराम गंगराडे ने मासिक पत्रिका ‛प्रभा’ का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलालजी को सौंपा गया। सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। इसी वर्ष कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया।
1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान माखनलालजी ने विद्यार्थी के साथ मैथिली शरण गुप्त और महात्मा गांधी से मुलाकात की। महात्मा गाँधी द्वारा आहूत  के ‘असहयोग आंदोलन’ में महाकौशल अंचल से पहली गिरफ्तारी देने वाले माखनलालजी ही थे। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उन्हें गिरफ्तारी देने का प्रथम सम्मान मिला।
1943 में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा ‘देव पुरस्कार’ माखनलालजी को ‘हिम किरीटिनी’ पर दिया गया था। 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की स्थापना होने पर हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार माखनलाल चतुर्वेदी को ‘हिमतरंगिनी’ के लिए प्रदान किया गया।
राष्ट्रीय आंदोलनों के अलावा हिंदी साहित्य के प्रति माखनलाल चतुर्वेदी का योगदान व त्याग अविस्मरणीय है। उनके योगदानों को देखते हुए 1963 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से अलंकृत किया जिसे 10 सितंबर 1967 को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले ‛राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक’ के विरोध में  वापस लौटा दिया।
30 जनवरी 1968 को कालजयी कृतित्व वाले बहुआयामी व्यक्तित्व माखनलाल चतुर्वेदी का  भोपाल में निधन हो गया।
दादा माखनलाल चतुर्वेदी की आज जयंती है। इस अवसर पर उनकी रचित एक  कविता साझा कर रहा हूं जो मुझे बेहद पसंद है :

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक

अजय कुमार

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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