बिहार के कई गांवों में घंटों रहा मोबाइल बंद, अफ़वाह को रोकने में प्रशासन नाकाम

डॉ. क़मर तबरेज़

19 जनवरी, 2020: देश में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ व्यपाक पैमाने पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अब अफ़वाहों ने भी अपने पांव पसारने शुरू कर दिये हैं। आज बिहार के कई ज़िलों में हज़ारों ग्रामीणों ने महज़ एक अफ़वाह के चलते घंटों अपने मोबाइल फ़ोन बंद रखे। इस बीच अगर उन जगहों पर कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो बाहर से कोई सहायता भी नहीं पहुंच पाती। हैरानी इस बात पर है कि प्रशासन भी ऐसी अफ़वाहों को रोकने में नाकाम है।

उत्तरी बिहार के सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी ब्लॉक से आज हैरान कर देने वाली ख़बर मिली। दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे कई शहरों में काम करने गए कई लोगों ने हमें बताया कि वे अपने रिश्तेदारों को सुबह 10 बजे से फ़ोन लगा रहे हैं, लेकिन उनसे बात नहीं हो पा रही है। सभी के फ़ोन बंद पड़े हैं। किसी एक का मोबाइल स्विच ऑफ़ होता, तो बात समझ में आती। लेकिन, अगर 5,000 की आबादी वाले पूरे गांव का ही फ़ोन बंद हो जाए, तो शक होता है। पहले तो उन्हें लगा कि हो सकता है गांव का मोबाइल टॉवर ख़राब हो गया हो। लेकिन शाम को जब चार बजे के बाद कुछ लोगों ने अपने मोबाइल फ़ोन चालू किये, तब उनसे पूरी घटना की जानकारी मिली।

जामिया स्टूडेंट ऑर जामिया भूतपूर्व छात्र नाम से किसी ने व्हॉट्स ऐप से लोगों को मैसेज भेजना शुरू किया, जिसमें लोगों से गुज़ारिश की गई थी कि वे 19 जनवरी को दिन में 2 बजे से 3 बजे तक अपने-अपने मोबाइल बंद कर दें। इसमें सीएए, एनआरसी, एनपीआर के ख़िलाफ़ आंदलोन को मज़बूत करने की दलील देते हुए लिखा गया कि “…..ये लड़ाई हमें हर तरह से लड़नी है। जैसे सरकार जनता से मिल कॉल लगवा कर गिनती साबित करना चाहती है, हमें भी उसी तरह से सरकार को जवाब देना है।”

हमने फुलवरिया, नरहरपुर भलहा, बोखरा आदि कई गांवों के लोगों से बात की, लेकिन कोई भी हमारे इन सवालों का सही जवाब नहीं दे पाया कि मोबाइल फ़ोन बंद रखने से क्या फ़ायदा हुआ। किसी ने कहा कि अमारते शरीआ की तरफ़ से यह कॉल दी गई है, तो किसी ने कहा कि डॉयरेक्ट दिल्ली से फ़ोन आया था। फुलवरिया गांव में इतना अफ़रा-तफ़री का आलम था कि कुछ महिलाएं सुबह से ही गांव में चिल्लाती फिर रही थीं कि अपने-अपने फ़ोन जल्दी से बंद कर लो, मानों कोई बड़ी मुसीबत आने वाली हो। लोगों ने इस ख़बर की पड़ताल करने की ज़हमत गवारी नहीं की और आनन-फ़ानन में पूरे गांव ने अपने मोबाइल बंद कर लिये।

हमने कुछ लोगों से जब यह पूछा कि मोबाइल फ़ोन बंद करने से क्या फ़ायदा मिला, तो किसी ने कहा कि मोबाइल कंपनियों का घाटा हुआ है। लेकिन सीएए, एनआरसी, या एनपीआर जैसे क़ानून से भला इन मोबाइल कंपनियों का क्या लेना-देना है कि लोग उनका घाटा कराना चाहते हैं? ज़ाहिर है, किसी के पास इसका जवाब नहीं था। फिर हमने दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया के कुछ पूर्व छात्रों से बात की, तो उन्होंने भी इसे नकार दिया और कहा कि उनकी तरफ़ से ऐसी कोई अपील जारी नहीं की गई है।

लोक सभा में यूपी के अमरोहा से सांसद, कुंवर दानिश अली ने अलबत्ता यह कहा कि शाहीन बाग के आंदोलन से बहुत से युवा भी जुड़ रहे हैं और नए-नए आइडिया दे रहे हैं। हो सकता है कि बिहार में भी ऐसे ही किसी युवा ने इसके दुष्परिणामों पर सोच-विचार किये बिना ही यह अफ़वाह उड़ा दी हो।

सवाल यही है कि अगर इन गांवों में कोई अप्रिय घटना हो जाती, तो उसका ज़िम्मेदार कौन होता, या लाइफ़-लाइन के कट जाने से वहां प्रशासन की ओर से त्वरित कार्यवाही कैसे हो पाती? मुख्यमंत्री नितीश कुमार आज अपने जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत राजधानी पटना में मानव श्रृंखला बनवाने में व्यस्त थे और उधर सीतामढ़ी ज़िले में गांव के गांव मोबाइल बंद करके एक नया रिकॉर्ड बना रहे थे। प्रशासन की तरफ़ से कोई खोज ख़बर नहीं ली गई और ना ही इस अफ़वाह को शुरू करने वाले उस सरफिरे व्यक्ति को पकड़ा गया, जिसने कुछ घंटों के लिए ही सही, हज़ारों लोगों को मुसीबत में डाल दिया।

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