तबलीगी जमात का गवाह – दरूड़ का कुआँ

  • डॉ. क़मर तबरेज़

दिल्ली की बस्ती हज़रत निज़ामुद्दीन केवल दरगाह के लिए ही मश्हूर नहीं हैं, बल्कि भारत सहित पूरे विश्व में फैली तबलीगी जमात का हेडक्वार्टर भी यहीं पर है, जिसे बंगला वाली मस्जिद कहते हैं। इसी जगह से हज़रत मौलाना इलियास ने 1926 में इस्लाम धर्म के प्रचार (तबलीग) का काम शुरू किया था। तबलीगी जमात से जुड़े लोग बताते हैं कि मौलाना इलियास ने इसके लिए सबसे पहले हरियाणा के मेवात का दौरा किया, जहाँ उनकी भेंट मियाँजी मूसा से हुई। जिस समय मौलाना इलियास वहाँ पहुँचे, उस समय मियाँजी मूसा अपने खेत में हल जोत रहे थे। मौलाना ने उनके पीछे-पीछे चलते हुए धर्म और इस्लाम के बारे में समझाना शुरू किया। मियाँजी मूसा पढ़े-लिखे नहीं थे, बल्कि एक मामूली किसान थे और अपने खेतों पर काम करके किसी तरह गुज़ारा चलाया करते थे। उन्हें मौलाना की बातें समझ में नहीं आईं, इसलिए उन्होंने मौलाना इलियास से कहा कि वह चले जाएँ और उन्हें खेत जोतने दें। लेकिन मौलाना ने उनकी बात नहीं मानी और उनके पीछे-पीछे चलते हुए दीन (इस्लाम धर्म) की बातें जारी रखीं। दोपहर का समय था, धूप भी तेज़ थी। ऊपर से हल जोतने का मेहनत भरा काम। मियाँजी मूसा को गुस्सा आया और उन्होंने मौलाना इलियास को डंडा मार दिया।

लेकिन मौलाना ने हार नहीं मानी और पहले की ही तरह समझाते रहे। कुछ देर बाद मियाँजी मूसा ने झिंझिलाते हुए कहा कि, चलो कहाँ चलना है। मौलाना इलियास उन्हें मस्जिद लेकर आए, नमाज़ पढ़ने के लिए तैयार किया और फिर कुछ दिनों के लिए अपने साथ अल्लाह के रास्ते में चलने को कहा। इसके बाद मियाँजी मूसा की शक्ल में मौलाना इलियास को तबलीगी जमात के काम को आगे बढ़ाने में काफ़ी मदद मिली। उन्हीं के माध्यम से पूरे मेवात में मुसलमानों का ध्यान इस्लाम की तरफ़ आकर्षित करने में सफलता मिली। यही वजह है कि लगभग 95 साल का लंबा समय बीत जाने के बाद आज भी मेवात के अधिकतर मुसलमान तबलीगी जमात से जुड़े हुए हैं और इससे संबंधित कोई भी व्यक्ति उनके पास जाता है, तो उसका बड़ा आदर करते हैं।

मेवात में ऐसे कई गाँव हैं, जहाँ के लोग मौलाना इलियास के अपने इलाक़े में दौरे और उनसे जुड़ी अन्य बातों का ज़िक्र करते हैं। ऐसी ही एक कहानी दरूड़ के कुँए की है, जिसे मौलाना इलियास की निशानदेही पर स्थानीय लोगों ने खोदा था। आश्चर्य की बात यह है कि वर्तमान नूह जिले की फ़िरोज़पूर झिरका तहसील के महूँ गाँव में उस समय के जितने भी कुँए थे, वे सभी के सभी 15-20 साल पहले सूख गए। अब उनमें ज़रा भी पानी नहीं बचा है। लेकिन 90 साल से भी ज़्यादा पुराने दरूड़ के कुँए में आज भी पानी मौजूद है, जिससे ना सिर्फ़ इंसान अपनी प्यास बुझाते हैं बल्कि स्थानीय लोग अपने जानवरों को भी इसका पानी पिलाते हैं।

 

हैरानी की बात यह भी है कि यह कुआँ अरावली पहाड़ी के बीच एक ऐसे स्थान पर है, जिसके चारों ओर कोई आबादी नहीं है। यह जगह हरियाणा और राजस्थान की सीमा पर स्थित है। दरूड़ से 4 किमी. दक्षिण दिशा में पैदल चलने के बाद राजस्थान के अलवर जिले का पहला गाँव आता है, जिसका नाम है नाँगल। जबकि दरूड़ से 3 किमी. उत्तर की ओर पैदल चलने के बाद नूह जिले का महूँ गाँव आता है। दरूड़ का कुआँ महूँ गांव की सीमा में स्थित है। वर्ष 1926 या 1927 में, मौलाना इलियास जब मेवात के किसी गाँव में इजतिमा (लोगों की भीड़) से संबोधित होने के बाद ऊंट से अलवर की तरफ़ जा रहे थे, तो दरूड़ के स्थान पर कुछ स्थानीय लोगों ने उनकी शक्ल-व-सूरत देखकर पानी के लिए दुआ करने की अपील की, क्योंकि तब उस पूरे इलाक़े में पानी की भयंकर कमी हुआ करती थी। अतः, मौलाना इलियास ने एक पत्थर लेकर उस स्थान पर चिह्न लगा दिया था, और कहा था कि यहाँ पर खुदाई करो, अल्लाह की रहमत से तुम्हें पानी ज़रूर मिलेगा।

इस वीडियो में महूँ गाँव के एक किसान, शहीद अहमद उसी कहानी को बयान कर रहे हैं।

https://youtu.be/rJ5sra1YT7k

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