9 बजे 9 मिनट जो हुआ उसका मतलब समझिए

पंडित ताइ

दिया जलाने की बात हुई थी, मोबाइल के फ्लैश लाइट या टोर्च से 9 मिनट तक अंधेरे पर विजय पाना था. भारत के प्रधानमंतिरी नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस की महामारी और देश भर में चल रहे लॉक डाउन के बीच 3 अप्रैल को ये अपील की थी कि हम भारतवासी 5 अप्रैल को रात 9 बजे अपने अपने घरों की बत्तियां बुझा कर दिए रौशन करेंगे, मोबाइल के फ्लश लाइट को ऑन करेंगे, इस तरह महामारी के डर, खौफ और उदासी पर रौशनी का झमाका हमें हौसला देगा और उन तमाम लोगों को भी जो दिन रात हमारी जान बचाने की फ़िक्र में अपनी जान दांव पर लगाए हुए हैं.

आप इस वक्त जहां भी होंगे आपने वह नज़ारा देखा होगा जो हमारे यहां दिवाली के मौके पर होता है. रविवार रात को 9 बजे कुछ वही माहौल नजर आया। पटाखों का शोर, तरह तरह की रंग बिरंगी रौशनी और देर तक घरों की छतों और बालकनी यानी हर तरफ ऐसा माहौल जैसे कोई उत्सव है. टीवी चैनलों ने 9 बजते ही भाजपा के तमाम बड़े नेता के साथ देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की दिए के साथ फोटो दिखाते हुए ये बताने लगे कि देखिए कैसे इस वक़्त पूरा भारत एकता और एकजुटता दिखा रहा है.

इस वक़्त पूरा विश्व और भारत कोरोना की महामारी से जूझ रहा है. जब अमेरिका जैसे विकसित और संपन्न देश में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और भारत में अभी अभी हमने लॉक डाउन के बाद लाखों मजदूरों, गरीबों को सड़क पर बेसहारा, परेशान हाल अपने घरों की तरफ लौटते देखा है. रोते हुए पैदल हज़ार दो हज़ार किलोमीटर तक सफ़र करने वाले इन लोगों में से कितनों को पता था कि पैदल चलते हुए भूख से वे उस देश में मर रहे हैं जिसे यहां की राजनीति और उस राजनीति से अपनी सत्ता बनाने और बचाने वाले विश्व गुरु बनाने का दावा कर रहे हैं.

आज भी जब पूरा भारत अपनी बालकनी और छतों पर था तो ऐसा लग रहा था कि हमने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता है या दिवाली का जश्न मना रहे हैं. आख़िर ये कौन लोग हैं जिन्हें कोरोना और इस महामारी की गंभीरता का ज़रा भी एहसास नहीं है जिसमें लाखों जानें जाने का डर है. कारोबार बंद है, दफ्तरों पर ताले पड़ गए हैं, बेरोजगारी और भूख की भीड़ में इज़ाफा होने वाला है, और हम पटाखों के शोर के साथ उत्सव मना रहे हैं.

हमने जब सत्ता से सवाल पूछना था, जांच किट की मांग करना थी, हेल्थकेयर के ढांचा को मज़बूत करने की आवाज़ उठानी थी उस वक़्त हम सब प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर अपनी तमाम असंवेदनशीलता का नगाड़ा इतने जोर से बजाने में लग गए कि दुनिया भर में इसकी आवाज़ पहुंच गई.

आपकी इस अदा पर पीएम मोदी का फ़िदा होना स्वभाविक है क्योंकि महामारी का उत्सव लोकतंत्र में आपको नहीं सत्ता को मज़बूत कर रहा है।

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