इंसानी मदद के तलबगार हैं दिव्यांगः नजरे आलम

इंसानी मदद के तलबगार हैं दिव्यांगः नजरे आलम
दिव्यांगों को भी मिले समाज में समान अवसरः एजाज अहमद/लाडले
दरभंगा- प्रतिवर्ष 3 दिसंबर का दिन दुनियाभर में, दिव्यांगों की समाज में मौजूदा स्थिति, उन्हें आगे बढ़ाने हेतु प्रेरित करने तथा सुनहरे भविष्य हेतु भावी कल्याणकारी योजनाओं पर विचार-विमर्श करने के लिए मनाया जाता है। इसी संबंध में अल-मदद एजुकेशनल एण्ड वेलफेयर ट्रस्ट, पटना के द्वारा आज दिनांक- 3 दिसंबर, 2019 मंगलवार को दिन के 11 बजे से अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के अवसर पर एक जागरूता अभियान का आयोजन मिथिला आई0टी0आई0 जमालचक, दरभंगा के काॅन्फ्रेंस हाॅल में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आॅल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवाँ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नजरे आलम शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड, पटना के पूर्व अध्यक्ष डा0 एजाज अहमद शामिल हुए, विशिष्ट अतिथि के रूप में जनाब असरारूलहक लाडले साथ ही संस्था के अध्यक्ष सह मिथिला आई0टी0आई0 के सचिव ई0 मो0 फखरूद्दीन कमर, काॅलेज निदेशक ई0 मो0 अजहरूद्दीन, प्राचार्य ई0 गणेश प्रसाद राय, कालेज शिक्षक एवं सैकड़ों की संख्या में छात्र शामिल हुए। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री नजरे आलम ने बताया कि दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र संघ की एक मुहिम का हिस्सा है जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों को मानसिक रुप से सबल बनाना तथा अन्य लोगों में उनके प्रति सहयोग की भावना का विकास करना है। एक दिवस के तौर पर इस आयोजन को मनाने की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1992 से हुई थी। जबकि इससे एक वर्ष पूर्व 1991 में सयुंक्त राष्ट्र संघ ने 3 दिसंबर से प्रतिवर्ष इस तिथि को अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस के रूप में मनाने की स्वीकृति प्रदान कर दी थी। श्री आलम ने आगे कहा कि दिसम्बर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांगों को दिव्यांग कहने की अपील की थी। जिसके पीछे उनका तर्क था कि शरीर के किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं। विकलांग शब्द उन्हें हतोत्साहित करता है। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर देश के लोगों ने विकलांगो को दिव्यांग तो कहना शुरू कर दिया लेकिन लोगों का उनके प्रति नजरिया आज भी नहीं बदल पाया है। आज भी समाज के लोगों द्धारा दिव्यांगों को दयनीय दृष्टि से ही देखा जाता है। भले ही देश में अनेकों दिव्यांगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया हो मगर लोगों का उनके प्रति वहीं पुराना नजरिया बरकरार है। विशिष्ट अतिथि असरारूलहम लाडले ने कहा कि मेडिकल कारणों से कभी-कभी व्यक्ति के विशेष अंगों में दोष उत्पन्न हो जाता है, जिसकी वजह से उन्हें समाज में ‘विकलांग‘ की संज्ञा दे दी जाती है और उन्हें एक विशेष वर्ग के सदस्य के तौर पर देखा जाने लगता है। आमतौर पर हमारे देश में दिव्यांगों के प्रति दो तरह की धारणाएं देखने को मिलती हैं। पहला, यह कि जरूर इसने पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा, इसलिए उन्हें ऐसी सजा मिली है और दूसरा कि उनका जन्म ही कठिनाइयों को सहने के लिए हुआ है, इसलिए उन पर दया दिखानी चाहिए। हालांकि यह दोनों धारणाएं पूरी तरह बेबुनियाद और तर्कहीन हैं। वहीं अपने अध्यक्षी भाषण में एजाज अहमद ने कहा कि दिव्यांगों पर लोग जाने-अनजाने छींटाकशी करने से बाज नहीं आते। वे इतना भी नहीं समझ पाते हैं कि क्षणिक मनोरंजन की खातिर दिव्यांगों का उपहास उड़ाने से भुक्तभोगी की मनोदशा किस हाल में होगी। तरस आता है ऐसे लोगों की मानसिकता पर, जो दर्द बांटने की बजाय बढ़ाने पर तुले होते हैं। एक निःशक्त व्यक्ति की जिंदगी काफी दुख भरी होती है। घर-परिवार वाले अगर मानसिक सहयोग न दें तो व्यक्ति अंदर से टूट जाता है। वास्तव में लोगों के तिरस्कार की वजह से दिव्यांग स्व-केंद्रित जीवनशैली व्यतीत करने को विवश हो जाते हैं।
दिव्यांगों का इस तरह बिखराव उनके मन में जीवन के प्रति अरुचिकर भावना को जन्म देता है। देखा जाये तो भारत में दिव्यांगों की स्थिति संसार के अन्य देशों की तुलना में थोड़ी दयनीय ही कही जाएगी। दयनीय इसलिए कि एक तरफ यहां के लोगों द्वारा दिव्यांगों को प्रेरित कम हतोत्साहित अधिक किया जाता है। कुल जनसंख्या का मुट्ठी भर यह हिस्सा आज हर दृष्टि से उपेक्षा का शिकार है। देखा यह भी जाता है कि उन्हें सहयोग कम मजाक का पात्र अधिक बनाया जाता है। दूसरी तरफ विदेशों में दिव्यांगों के लिए बीमा तक की व्यवस्था है जिससे उन्हें हरसंभव मदद मिल जाती है जबकि भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है। हां, दिव्यांगों के हित में बने ढेरों अधिनियम संविधान की शोभा जरूर बढ़ा रहे हैं, लेकिन व्यवहार के धरातल पर देखा जाये तो आजादी के सात दशक बाद भी समाज में दिव्यांगों की स्थिति शोचनीय ही है। जरूरी यह है कि दिव्यांगजनों के शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधन के साथ उपलब्ध अवसरों तक पहुंचने की सुलभ व्यवस्था हो। दूसरी तरफ यह भी देखा जा रहा है कि प्रतिमाह दिव्यांगों को दी जाने वाली पेंशन में भी राज्यवार भेदभाव होता है। मसलन, दिल्ली में यह राशि प्रतिमाह 1500 रुपये है तो झारखंड सहित कुछ अन्य राज्यों में विकलांगजनों को महज 400 रुपये रस्म अदायगी के तौर पर दिये जाते हैं। समस्या यह भी है कि इस राशि की निकासी के लिए भी उन्हें काफी भागदौड़ करनी पड़ती है। कार्यक्रम का संचालन ई0 मो0 फखरूद्दीन ने किया। कार्यक्रम को संतोष कुमार, नीतीश कुमार, निशांत कुमार, मो0 मंजूर आदि ने भी संबांधित किया। वहीं दूसरी ओर इस अवसर पर मदरसा इस्लाहुल बनात सोभन, दरभंगा में भी जागरूकता अभियान चलाया गया जिसमें मदरसा की प्राचार्य सरवत अफरोज, मौलाना मिनहाज आलम, मौलाना नेयाज अहमद, मौलाना मुमताज आदि शामिल हुए।
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