इक़बाल नियाज़ी: उर्दू ड्रामों की आन बान शान

(इक़बाल नियाज़ी के जन्मदिन 15 मई पर विशेष लेख)
 
डॉ. नाज़ ख़ान
वो चांद है तो अक्स भी पानी में आएगा
किरदार ख़ुद उभर के कहानी में आएगा
 
मशहूर है कि कट्टरता और पागलपन में एक बहुत बारीक लकीर होती है। चालीस साल पहले एक युवक ने ड्रामे की उंगली थामकर इस नाज़ुक लकीर को चीरते हुए रंग मंच पर अपना पहला क़दम रखा। नाटकीय दुनिया के कुछ पंडितों ने उसे स्वागत योग्य क़रार दिया तो वहीं कुछ तथाकथित आलोचकों ने अपनी काली ऐनक की फ़्रेम से झांकते हुए उसे कुछ दिन का जोश कहकर तिरस्कार की खाई में धकेल दिया। एक अज्ञात से मोहल्ले के अनजान से लड़के की अगर कोई मेयारी तख़लीक़ या मानक कृति सामने आती तो यह संयोग हो सकता था, मेहनत हो सकती थी, क़िस्मत हो सकती थी मगर हुनर नहीं हो सकता था। लेकिन उस युवक ने लोगों के उपहास की परवाह किए बिना रचनात्मक रास्तों पर अपने क़दम बढ़ा दिए और फिर वह हुआ जिसका किसी को गुमान भी न था। उस युवा के लिखे ड्रामे “और कितने जलियांवाला बाग़?” (फुल लेंथ) ने राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त करके उर्दू का परचम बुलंद कर दिया। इससे पहले 1982 में उसे अपने एक दोस्त के साथ मिलकर “जलियांवाला बाग़ 28” नामक लघु ड्रामा लिखने पर और इंटरकॉलेज स्तर पर नुमाया कामयाबी हासिल करने पर वालिद शोर नियाज़ी (मरहूम) ने एक फ़ाउंटेन पेन तोहफ़े में दिया था। उसी दिन नाटकीय क्षितिज पर एक ग्रह दिखाई दिया था। जिसे आज दुनिया इक़बाल नियाज़ी के नाम से जानती है।
पहला ड्रामा:
इक़बाल नियाज़ी ने अपनी नाटकीय यात्रा को 14 साल की उम्र में शुरू किया था जब वह 9वीं कक्षा के छात्र थे। वालिद जिस स्कूल से जुड़े थे उस स्कूल के एक चैरिटी कार्यक्रम के लिए वह ड्रामा की खोज में थे। एक दिन इक़बाल नियाज़ी ने “इल्म, इमारत और अवाम” नाम से एक कच्ची पक्की स्क्रिप्ट लिखकर वालिद के हाथों में थमा दी। वालिद साहब चौंक गए। पढ़कर स्क्रिप्ट को ठीक किया और इक़बाल नियाज़ी के स्कूल टीचर अज़ीज़ुर्रहमान सर से वह ड्रामा निर्देशित करवाया जिसमें उनकी छोटी बहन तस्कीन नियाज़ी ने “इमारत” की दृष्टान्त भूमिका निभाई। ड्रामा बहुत सफल रहा और जिस उद्देश्य से लिखा गया था वह भी पूरा हुआ, स्कूल को ख़ूब डोनेशन मिला। वालिद साहब ने गर्व से बेटे को गले लगाया और उस दिन इक़बाल नियाज़ी ने भी अपने अंदर छिपी नाटककार की क्षमता का ख़ुद से परिचय कराया।
 
नाटकीय यात्रा:
विंस्टन चर्चिल ने कहा था, “The pessimist sees difficulty in every opportunity. The optimist sees the opportunity in every difficulty.” (निराशावादी हर अवसर में कठिनाई देखता है। आशावादी व्यक्ति हर कठिनाई में अवसर देखता है।) इक़बाल नियाज़ी ने अपने नाटकीय यात्रा के उतार चढ़ाव तय करते हुए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने उस्ताद लेजंडरी हबीब तनवीर साहब के ड्रामों की पेशकश और फ़ॉर्म ने उन्हें बहुत प्रभावित किया और वह उर्दू थिएटर को उसका खोया हुआ स्थान दिलाने के अथक प्रयासों में जुट गए। वह दौर हालांकि कुछ ऐसा था कि उर्दू ही नहीं हिंदी के ड्रामों को और स्टेज को भी तिरछी नज़रों से देखा जाता था। उर्दू थिएटर के साथ सौतेला व्यवहार ग़ैरों ने कम अपनों ने ज़्यादा बरता। फ़िल्म और टेलीविज़न की चुनौतियों ने उर्दू थिएटर को भी “लॉकडाउन” में रखा था। उस ज़माने में सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया नाम के पंछियों ने भी अपनी उड़ानें नहीं भरी थीं। इन कठोर परिस्थितियों में यह इक़बाल नियाज़ी का हौसला था कि वह ड्रामा शोज़ में लोगों को बुलाने के लिए दो सौ-तीन सौ पोस्टकार्ड्स अपने हाथों से लिखकर भिजवाते और ड्रामों के शैदाई उनकी इस अदा पर फ़िदा होकर शरीक भी होते और ड्रामों की आलोचना भी करते। इक़बाल नियाज़ी ने ठहरे हुए पानी में कंकड़ मारकर कंपन पैदा करने की शुरुआत कर दी थी। आज भी अनगिनत लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि ड्रामों का चस्का उन्हें इक़बाल नियाज़ी ने लगाया। वह आज भी सोशल मीडिया के माध्यम से अच्छे ड्रामों का विवरण ड्रामा दर्शकों तक पहुंचाने का नेक काम अंजाम दे रहे हैं।
नया मंच और इक़बाल नियाज़ी:
बक़ौल इक़बाल नियाज़ी “ड्रामा समाज से आंख मिलाना सिखाता है, नज़रें चुराना नहीं।” और इस बात का पालन करते हुए उन्होंने पारंपरिक, रौंदे हुए विषयों पर उर्दू ड्रामों को आस्था के फूल पेश करके विदाई दी और उनकी जगह कृष्ण चंद्र, मंटो, इस्मत, सलाम बिन रज़ाक़, साजिद रशीद, सुरेंद्र प्रकाश, सागर सरहदी जैसे ड्रामा निगारों और कहानी कारों को नाटकीय लबादा पहना कर उर्दू स्टेज पर उतारा और दर्शकों को बताया कि यह है आज का उर्दू थिएटर। अपने समाज से आंख मिलाता हुआ। इस तरह पारंपरिक क्लासिकी ड्रामों की सीढ़ियों से आधुनिक ड्रामे की मंज़िल तक पहुंचने में इक़बाल नियाज़ी ने बढ़त हासिल की और 200 से अधिक ड्रामे स्टेज करके भारत भर में उनके 4000 शोज़ किए। लेकिन इन चार हज़ार शोज़ में उनकी चालीस वर्षों की मेहनत और साधना और लगातार रंग कर्म करने की धुन शामिल है जो उन्हें निचला नहीं बैठने देती। उन्होंने अपने हर ड्रामे में कुछ नए अनुभव स्टेज पर किए जो कभी बहुत सफल हुए, कभी फ़्लॉप भी हुए लेकिन यह उनके लिए सम्मान से कम नहीं कि उनके समकालीन और विरोधी भी दबी ज़ुबान में इस बात को स्वीकार करते हैं कि इक़बाल नियाज़ी अपने ड्रमों में नित नए अनुभव करता है, कुछ नयापन लाता है।
 
रचनाएं:
इक़बाल नियाज़ी की अब तक ड्रामों की 5 किताबें सामने आ चुकी हैं जिनमें “दस रंगी तमाशे”, “सब ठीक है!!”, “एक नई उड़ान”, “गिरगिट और दूसरे ड्रामे” और “हम सिर्फ़ कोम्प्रोमाईज़ करते हैं (हिन्दी)” व अन्य दो किताबें प्रकाशन के मराहिल से गुज़र रही हैं जिनमें “होता है शब-ओ-रोज़ ड्रामा मेरे आगे” (ड्रामों के लेख, टिप्पणियाँ और ख़ाके) और “किस का लहू है कौन मरा? “(ड्रामों का संग्रह) इनके अलावा भी लगभग नौ ड्राफ़्टस छपने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जिनमें उर्दू ड्रामा, उर्दू थिएटर (लेख, टिप्पणियाँ और चुनिंदा कॉलम्स), “बैक स्टेज पर ज़िंदगी” (नज़्में), “सर्कस” (कहानी संग्रह), बच्चों के 100 स्टेज ड्रामे, हबीब तनवीर व्यक्तित्व और कला (शोध), मराठी ड्रामा, मराठी थिएटर (टिप्पणियाँ, लेख, स्केच), ड्रामा वर्कशॉप (स्टेज तकनीक पर) और नुक्कड़ नाटकों की पेशकश जैसी अहम किताबें हैं जिनका प्रकाशित हो कर दुनिया के सामने आना बहुत ज़रूरी है।
 
अवार्ड्स और सम्मान:
चार दशकों पर आधारित इक़बाल नियाज़ी की थिएटर की निस्वार्थ सेवाओं के लिए लिए उन्हें सर्वोच्च ग़ालिब अवार्ड (दिल्ली), साहित्य कला परिषद पुरस्कार (दिल्ली), पूना महोत्सव में आग़ा हश्र कश्मीरी पुरस्कार, हबीब तनवीर पुरस्कार, 5 विभिन्न संस्थाओं और थिएटर ग्रुप्स द्वारा लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड, मौलाना आज़ाद पुरस्कार, मजरूह पुरस्कार, साहिर लुधियानवी पुरस्कार, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी और बंगाल उर्दू अकादमी अवार्ड्स के अलावा ढेरों पुरस्कार व सम्मान शामिल हैं। उनका घर पुरस्कार और सम्मान की ट्रॉफियों से भरा है। मुंबई के न सिर्फ़ उर्दू ड्रामा ग्रुप्स बल्कि हिंदी और मराठी थिएटर ग्रुप्स ने भी उनकी थिएटर सेवा और उनके अमूल्य योगदान को सराहा है।
 
स्तंभकार:
इक़बाल नियाज़ी ने विभिन्न उर्दू अख़बारों में 9 वर्षों तक स्तंभकार की हैसियत से काम किया। पहली बार उर्दू, हिन्दी, मराठी ड्रामों पर टिप्पणियाँ, लेख, मालूमात, साक्षात्कार उर्दू अख़बारों में प्रकाशित हुए। उनके कॉलम्स “अक्स बर अक्स” और “रंग दर्शन” बेहद लोकप्रिय हुए जिनमें उन्होंने 400 से अधिक लेख उर्दू ड्रामों और रंगमंच पर क़लमबंद किए। उर्दू ड्रामों का माहौल बनाने और तमाशबीनों को जोड़ने में उनकी कोशिशों का बड़ा महत्व है।
 
प्रतिक्रिया:
इक़बाल नियाज़ी के बचपन के दोस्त और कॉलेज के साथी प्रसिद्ध शायर डॉ क़ासिम इमाम बताते हैं कि “शुरुआत में इक़बाल ने शायरी भी की, उपन्यास भी ख़ूब लिखे लेकिन जब वह ड्रामों की तरफ़ आए तो इतनी मेहनत की कि उर्दू ड्रामा जो घुटनों के बल चल रहा था उसे अपने पैरों पर खड़ा कर दिया और इसी लिए मैं इक़बाल को उर्दू ड्रामा का “मास्टरमाइंड” कहता हूँ।” थिएटर और फ़िल्म के बेहद मशहूर अभिनेता ज़ाकिर हुसैन ने अपनी वीडियो प्रतिक्रिया में कहा “जब भी हिन्दी या उर्दू ड्रामों की बात होती है तो वित्तीय परेशानियों, फ़ंड की कमी का रोना रोया जाता है लेकिन यह इक़बाल नियाज़ी की हिम्मत है की उन्होंने वित्तीय संसाधनों की कमी को कभी अपने पैरों की बेड़ियां बनने नहीं दिया लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाक़िफ़ होंगे कि ड्रामा स्टेज करने और माली संसाधनों के अभाव के बीच की इस खाई को पाटने के लिए इक़बाल नियाज़ी ने ड्रामों के अलावा म्यूज़िकल स्टेज शोज़ किए, शानू म्यूज़िकल के नाम से ग्रुप भी बनाया।”
इसके अलावा दूसरों के म्यूज़िकल शोज़ में बतौर एंकर काम किया शुद्ध व्यावसायिक तरीक़े से। यहां भी उन्होंने अपनी ज़ुबान से मोहब्बत को फ़रामोश नहीं किया और उर्दू के विख्यात शायरों कवियों नज़ीर अकबराबादी, ग़ालिब, साहिर लुधियानवी, मजरूह, कैफ़ी आज़मी और मजाज़ पर ड्रामाई जीवनी ख़ाके संगीत के पैराहन में ढाल कर ड्रामा और संगीत के शैदाइयों से ख़ूब दाद हासिल की। और इन सभी म्यूज़िकल शोज़, इवेंट्स, एंकरिंग से हासिल होने वाली राशि को उन्होंने स्टेज ड्रामा और कोष की कमी के बीच पुल निर्माण में ख़र्च कर दिया। हालांकि इसके लिए उन्हें उर्दू वालों की ज़बरदस्त आलोचना का सामना भी करना पड़ा। उर्दू के स्वयंभू आशिक़ों ने उन पर उर्दू ड्रामा और साहित्य से बेज़ारी और संगीत में उलझने का इल्ज़ाम लगाकर अपने आलोचनात्मक व्यवहार से उन्हें डिस्टर्ब करने की कोशिश भी की। इन दृश्यों की तो चश्मदीद गवाह मैं भी हूं।
 
किरदार का इक़बाल:
“किरदार आर्ट अकादमी” ग्रुप से मैं 6 साल पहले जुड़ी। बक़ौल जॉर्ज केली, “Boss says, Go, while leader says, let’s go.” (बॉस कहता है, जाओ, जबकि लीडर कहते हैं, चलो चलते हैं।) मैंने कभी इक़बाल नियाज़ी को “किरदार” के प्रमुख, चेयरमैन या क्रिएटिव डायरेक्टर नहीं बल्कि एक लीडर और मुरब्बी की हैसियत से देखा है। उनके ड्रामों के किरदार हमें हर दौर से जुड़ाव रखते हुए नज़र आते हैं। आज किरदार ग्रुप से लगभग डेढ़ सौ अभिनेता जुड़े हैं और इक़बाल नियाज़ी किसी बाग़ के माली की तरह नई पीढ़ी में ड्रामों का बीज बो कर उसकी सिंचाई करने में रात-दिन अथक लगे हुए हैं। ड्रामे से उनके जुनून का अंदाज़ा इस घटना से होता है कि उन्हें गंभीर क़मर दर्द था, दो महीने से क़मर बेल्ट बांधकर वह रिहर्सल पर आ रहे थे। एक ड्रामे का सीन समझाने के लिए वह अचानक ज़मीन पर गिरकर लोटने लगे, सारे अभिनेता आश्चर्य से देखते रहे। उन्हें बिल्कुल ख़्याल नहीं रहा कि वह अभी ज़ेरे इलाज हैं और उनके क़मर में प्रोटेक्टिव बेल्ट लगा है। मुमकिन है उस दिन उनके जुनून को देखते हुए दर्द ने भी उनसे दूर रहने में ही भलाई जानी।
 
उन्होंने रिहर्सल के दौरान 80 से अधिक ग़ैर मुस्लिम, ग़ैर उर्दू-दां कलाकारों को उर्दू सिखाई। 200 से अधिक कलाकारों को उर्दू से जोड़ दिया। कया यह उर्दू भाषा से उनकी मोहब्बत और आस्था का अमली सबूत नहीं?? आज वह कलाकार फ़िल्मों में, टीवी और स्टेज पर अपनी सफलता के रंग बिखेर रहे हैं और गाहे गाहे आकर इक़बाल नियाज़ी के गले लगकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इक़बाल नियाज़ी की मिसाल उस ऐतिहासिक इमारत सी है जिसकी बुनियाद में उनका लहू और पसीना शामिल है। आज उनके मज़बूत कंधे पर “किरदार” की बुलंद-बाला पक्की इमारत पिछले चालीस वर्षों से खड़ी है, जिसकी स्थिरता में प्रतिदिन वृद्धि ही हो रही है।
 
सामाजिक जागरूकता:
इक़बाल नियाज़ी ने सामाजिक जागरूकता के लिए मुस्लिम इलाक़ों में नुक्कड़ नाटक किए। सफ़दर हाशमी की हत्या के बाद उन्होंने किरदार के कलाकारों के साथ पहली बार मुस्लिम मोहल्लों में नुक्कड़ नाटक किए और एक नया मील का पत्थर स्थापित किया। यह सिलसिला आज भी जारी है। वो माली नुक़सान उठाकर स्ट्रीट प्ले और और कॉर्नरज़ प्ले करते हैं और संतुष्ट होते हैं। वह अपने अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हैं और हर नुक़सान ख़न्दा-पेशानी स्वीकार करते हैं। उन्होंने हमेशा अपने ड्रामों को, उर्दू स्टेज गतिविधियों को फ़ायदे और नुक़सान के तराज़ू से अलग ही रखा। 32 साल तक शिक्षण से जुड़े रहने और अपने सभी निजी और घरेलू ज़िम्मेदारियां निभाते हुए ड्रामा थिएटर को अपना पहला प्यार मानकर उससे जुड़े रहना और लगातार रंग कर्म करते रहना कोई आसान काम नहीं।
 
इक़बाल नियाज़ी के ज़ाहिर का कुछ हिस्सा अभी भी दुनिया की नज़रों से छिपा है। उनके अंदर आज भी एक छटपटाहट है। अब भी बहुत कुछ बाहर निकलने को बेचैन है। आज भी उनकी बेचैन आंखों में भविष्य के ढेर सारे सपने रहते हैं। वह कुछ शॉर्ट फ़िल्में, डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहते हैं। वो स्ट्रगल्स, संघर्ष करते कलाकारों के लिए कुछ करना चाहते हैं। वे थिएटर, फ़िल्म अभिनय का एक विश्वसनीय और प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट खोलना चाहते हैं। वह मुंबई में ही एक छोटा सा बॉक्स थिएटर स्थापित करना चाहते हैं। सपने बहुत सारे हैं, संसाधन कम। चालीस बरस पहले का वो भरपूर तवानाई वाला युवक आज भी उनके अंदर बाक़ी है। पूरी शक्ति और मनोबल के साथ और उन्हें बेहतर से बेहतरीन होने की प्रेरणा देता रहता है।
 
वह क़लम:
मरहूम वालिद साहब का तोहफ़े में दिया वो फ़ाउंटेन पेन उनकी रचनात्मक क्षमताओं के दरीचे से एक नई सोच की किरण को काग़ज़ पर बिखेरने का काम अब भी बख़ूबी कर रहा है। लोग कहते हैं इक़बाल नियाज़ी ड्रामों का मास्टरमाइंड है लेकिन जहां से मैं देख रही हूँ नियाज़ी उर्दू अदब, साहित्य, संस्कृति, कला और ड्रामों के संगम से निकलने वाला वह दरिया है जो एक बड़ी प्रवाह और शुचिता के साथ रचनात्मक समुद्र से जा मिलता है और समुद्र में जो डूबा …. सो पार!!
 
(डॉ. नाज़ ख़ान किरदार आर्ट अकादमी की वाइस चेयरपर्सन हैं)
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